जोतरूप हरि श्री गुरु नानक साहिब

सन् 1469 ई. को ‘श्री गुरु नानक साहिब जी के मनुष्य रूप में प्रकट हुई निरंकार-ज्योति ने सन् 1708 ई. तक के 240 वर्ष इस पृथ्वी पर प्रकाश डाला। इस दैवी-ज्योति ने मनुष्य-जाति में लगातार दैहिक रूप से विचरण कर मानवता का मार्ग प्रकाशमान किया। वे एक तीसरे पंथ- एक नये धर्म, प्रारंभिक पवित्राता को अपने रूप व इलाही शान द्वारा आकार में लाए। महान् गुरुओं ने रूहानी महिमा के अनुपम उदाहरणों द्वारा नवीन इतिहास का सृजन किया। इस पवित्रा ज्योति ने पापी व बीमार मनुष्य जाति का कायाकल्प कर दिया। यह ज्योति महान् गुरुओं के पवित्रा मुखारविंद से निकलकर जीवनदायी अमृत की तरह आगे चलती रही तथा डूबती आत्माओं को बचाती रही।

अमृत वाणी आरंभ से ही गुरुस्वरूप थी। गुरु नानक देव जी ने इस अमृतवाणी से ही उपदेश दिया। यही ज्योति गुरु अंगद देव जी के द्वारा प्रज्वलित हुई। उपदेश वाणी द्वारा प्रवाहित होता रहा। तीसरी पातशाही श्री गुरु अमरदास जी गद्दी पर विराजमान हुए तो उसी प्रकार उपदेश होता रहा। फिर गुरु ग्रंथ साहिब गद्दी पर विराजमान हुए, उपदेश उसी प्रकार वाणी द्वारा होता रहा। गुरमुखों के लिए स्वयं गुरु जी ही बैठे वाणी द्वारा उपदेश कर रहे हैं। मूर्ख के लिए अन्तर है, परन्तु ज्ञानी व्यक्ति के लिए वाणी प्रत्यक्ष गुरु है तथा गुरु ग्रंथ साहिब जी गद्दी पर हैं। उपदेश वाणी द्वारा है। गुरमुखों के लिए कोई अन्तर नहीं है। अन्तर हमारी दृष्टि में है, दृष्टि पक्की करनी है।

हाज़र नाज़र जागती ज्योति ज़ाहरा जहूर साहिब श्री गुरु ग्रंथ साहिब अपने नूर से इस समस्त जगत् को ईश्वरीय-प्रकाश से भर रहे हैं।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के हर पवित्रा शब्द में वही प्रकाश तथा वही चमक विद्यमान है जो कि श्री गुरु नानक साहिब द्वारा इसके रचने के समय थी। यह मानव-ज्ञान से भी कहीं अधिक शक्तिशाली व प्रतापवान है। जब श्री गुरु नानक साहिब जी ने इस पावन वाणी का उच्चारण किया था तो बड़े से बड़े पापी भी इन शब्दों को सुनकर संत बन गए थे। अगर हम ‘पुस्तक-दृष्टि’ व ‘पुस्तक- भावना’ को ‘गुरु-दृष्टि’ व ‘गुरु-भावना’ में बदल लें तब इस वाणी में हमें वही सामथ्र्य दिखाई देगा। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में श्री गुरु नानक साहिब की सदेह उपस्थिति में विश्वास से जादुई प्रभाव होता है। श्री गुरु नानक साहिब जी का दिव्य रूप देश व काल की सीमाओं से परे है।

उपर्युक्त विधि के अनुसार श्री गुरु ग्रंथ साहिब की कृपाओं के द्वारा बाबा नंद सिंह जी ने दैनिक जीवन के व्यवहार में श्री गुरु ग्रंथ साहिब के आशीर्वादों को अविभाजित अंग बना दिया है। उन्होंने श्री गुरु ग्रंथ साहिब के ग्रंथमय विश्वास को श्री गुरु नानक साहिब के जगमगाते विश्व नूर में परिवर्तित किया। बाबा नंदसिंह जी ने गुरु नानक साहिब को हाज़र-नाज़र समझने की इस महान् और सरल विधि का एक दरिया बहाया है।

बाबा जी की इलाही भविष्यवाणी सुनकर मनुष्य जाति के झुण्डों के झुण्ड इस रक्षक जहाज़ श्री गुरु ग्रंथ साहिब का आश्रय लेने व कलयुग के भयानक भवसागर को पार करने के लिए उन की शरण में आने के लिए उमड़ पड़े।

अंधकार में भटकती लाखों आत्माओं को उन्होंने उनकी दिव्य मंज़िल, गुरु ग्रंथ साहिब तक पहुँचने के लिए आलोक दिया। उन्होंने नाम स्मरण की आध्यात्मिक सुन्दरता का उद्घाटन किया और प्रत्येक को जीवन में एक चेतन पवित्रा अनुभव की प्राप्ति के लिए माह में एक बार श्री गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ करने के महत्त्व को उद्घाटित किया। वे सहस्रों, लाखों लोगों को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की कृपा के प्रभामंडल में लाए। उन्होंने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के साथ प्रभु प्रेम का प्रत्यक्ष व गहरा सम्बन्ध स्थापित किया। यह प्रेम का रिश्ता एक विनम्र दास व उसके स्वामी, पुत्रा व पिता, एक विनम्र सिख, सर्वोच्च स्नेही व पूजनीय गुरु का रिश्ता था।