सब के दिलों की जानने वाले

सत्कार योग्य पिता जी के अपने शब्दों में- एक दिन ऐसा संयोग घटित हुआ कि डाकुओं का लगातार चार दिनों तक पीछा करने के बाद मैं मोगा स्थित अपने घर लौटा तो मैं थका हुआ तो था ही, और भूख भी बहुत जोर से लगी हुई थी। इसलिए मैंने तुरंत भोजन परोसने को कहा। किन्तु परोसा गया भोजन मुझे स्वादिष्ट नहीं लगा। मैं बिना भोजन किए ही उठ खड़ा हुआ और बाबा जी के दर्शनों के लिए ‘ठाठ’ की ओर चल पड़ा। जैसे ही मैंने बाबाजी को प्रणाम किया, पहली ही बात जो उन्होंने अपने शुभ मुखारविन्द से उच्चरित की, वह यह थी-

‘‘डिप्टी, रोटी का क्या है, जैसी मिली खा ली और गुरु नानक का धन्यवाद किया।’’

फिर मेरी ओर ऐसी कृपामयी दृष्टि डाली कि मेरा उत्तम स्वाद और ज़रूरतों के प्रति जो लगाव था, वह पूरी तरह समाप्त हो गया। तत्पश्चात् महान बाबाजी ने अपने कर-कमलों से प्रसाद देकर मुझ पर अनुपम कृपा की। यह ऐसा प्रसाद था जो कि सभी प्रकार की भूख प्यास को हमेशा के लिए मिटा देता है।