निष्कर्ष

Like a fragrant and vibrant flower of divine love, he perpetually lays prostrate at the lotus feet of his beloved Master Baba Nand Singh Ji Maharaj.

बाबा नरिन्द्र सिंह जी ने एक निराले धर्म, असीम पवित्रा आँसुओं के धर्म, परम प्रेम के धर्म, पूर्ण विनम्रता व पूर्ण श्रद्धा के धर्म, पूर्ण त्याग व अपने स्वामी के प्रति कुत्ते जैसी स्वामी-भक्ति के धर्म को अपने जीवन का आधार बनाया।

पहले उन्हें बाबा जी के दर्शन ही हुआ करते थे। अपने शीश पर उनके पवित्रा कर-कमलों का कोमल स्पर्श ही अनुभव होता तथा दृढ़ निश्चय में वृद्धि करने वाले वचन सुनाई देते। परन्तु बाद में बाबा जी के साथ प्रत्यक्ष बातें होने लगीं। उनके लिए महान् बाबा नंद सिंह जी महाराज दैहिक रूप में उपस्थित हो जाते, इस तरह यह सच्चाई सदैव सच का स्पष्ट अनुभव था, न कि केवल अंधविश्वास।

पिता जी सदैव उन के नाम-रस की मधुरता में स्नान करते तथा उनके चरण-कमलों के प्रेम-रस के आनंद में मस्त रहते थे। सतगुरु जी अलौकिक प्रेम के सच्चे दाता हैं। उनके भीतर चुम्बकीय शक्ति है, क्योंकि वह भाग्यशाली श्रद्धालुओं को प्रेम-रस की उच्च अवस्था में ले जाते हैं।

पिता जी के चेहरे की उगते सूर्य जैसी लाली में बाबा नंद सिंह जी महाराज के निरंकारी नूर के दर्शन होते। बाबा नरिन्द्र सिंह जी दिव्य प्रेम की जागती जोत थे। उन के सम्पर्वफ में आने वाला कोई भी इस दिव्य प्रेम से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। वह जिस स्थान पर भी रहे, प्रभु-प्रेम की सुगन्ध बिखेरते रहे। इतना ही नहीं अपितु सम्पूर्ण वातावरण में सुगन्धित पवन बहने लग जाती तथा एक असाधारण आनंद व शान्ति छा जाती। एक बार उन्होंने कहा था कि

सूर्य व चाँद भौतिक प्रकाश देते हैं, अतः उनका प्रकाश भी दिन के कुछ भाग में सीमित होकर रह जाता है। परन्तु बाबा नंद सिंह जी महाराज द्वारा बाँटा गया प्रकाश चिरस्थायी है। यह प्रकाश कभी अदृश्य नहीं होता तथा न ही कभी समाप्त होता है।

शुद्ध ईश्वरीय प्रेम उन का परम धर्म था तथा मन की विनम्रता उन की परम सम्पत्ति थी। तन, मन व धन अपने प्रिय बाबा जी को अर्पण करते हुए उन के प्रेम के बंधनों में बँधे रह कर आत्मिक उच्च अवस्था के कई अचम्भित करने वाले अद्भुत कौतुक दिखाए। उन का मुखमंडल रूहानी आकर्षण व प्रसन्नता प्रदान करने वाला होता। वह श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की सेवा व पूजा निष्पाप पवित्राता से करते।

सतगुरु जी का शुद्ध प्रेम व अमृत नाम की शक्ति कितनी मंगलमयी, अलौकिक व चमत्कारी है! नामदेव व धन्ना जैसे भक्तों के हृदयों में प्रेम की यह शक्ति इतनी चमत्कारी थी कि उन्होंने अपने दैहिक नेत्रों द्वारा प्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन कर लिए। मेरे पूजनीय पिता जी ने बाबा नंद सिंह जी महाराज से केवल उन के ही दर्शन माँगे थे। उन्होंने अपने सतगुरु जी से सतगुरु की ही अभिलाषा की थी, क्योंकि वे सतगुरु के बिना अन्य कोई इच्छा रखते ही नहीं थे। उन्होंने सतगुरु के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। उन्होंने प्रत्येक श्वास सतगुरु जी की पवित्रा याद में गुज़ार कर अपने जीवन को सफल कर लिया हुआ था।

अपने प्रिय सतगुरु जी के वियोग की पीड़ा में उनकी हालत बहुत दयनीय हो गई थी। आँसुओं की असीम नदी ही उनकी भक्ति, उनकी पूजा, उनका धर्म, उनकी प्रार्थना, उनका विचार, उनकी भाषा, उनकी तपस्या तथा उनका सदाचार बन चुकी थी।

वह प्रेम में प्रवाहित आँसुओं द्वारा बाबा नंद सिंह जी महाराज के पवित्रा चरण-कमलों को नित्य स्नान करवाते। उनके नेत्रों से बहते आँसुओं में इलाही सूरत के दर्शन होते थे। उनका यह निलय निपट निराला था। अमूल्य मोतियों की तरह उनके पवित्रा आँसू तप, तेज वाले तथा चमत्कारी होते। उनके इस अथाह प्रेम को बाबा जी का आशीर्वाद प्राप्त था।

प्रेम-रस ही महारस है। प्रेम-रस ही सच्ची भक्ति का सार है। प्रेमा-भक्ति जैसी कोई अन्य भक्ति नहीं हो सकती। परम कृपालु बाबा नंद सिंह जी महाराज ने पिता जी को प्रेम-रस की दात बख्शी थी। इस निराली तथा परम श्रेष्ठ दात के कारण उन का जीवन प्रभु-प्रेम से भरा हुआ था। यह शुद्ध प्रेम ही सदैव उनका जीवन-आधार था। भाई मतिदास जी ने अपने प्रिय सतगुरु श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के प्रेम के लिए महान् कुर्बानी दे दी। यह प्रेम उगते सूर्य की तरह उनके चेहरे से झलकता था। दिव्य प्रेम, विनम्रता व बलिदान सब एक रूप हैं, इन का निवास प्रभु-प्रेम में भीगे हृदय के भीतर होता है। पिता जी के खुले चैड़े नूरानी मस्तक पर बाबा नंद सिंह जी महाराज का प्रेम प्रत्यक्ष झलकता, जो किसी से छिपा हुआ नहीं था।

नाम को किसी अस्त्रा-शस्त्रा से काटा नहीं जा सकता। इस को अग्नि से जलाया नहीं जा सकता, पानी में डुबोया नहीं जा सकता, पवन से सुखाया नहीं जा सकता तथा चोर या डाकू इसे लूट नहीं सकते। इस प्रकार प्रेम की इस सच्ची व पवित्रा भावना को कोई बाह्य वस्तु स्पर्श नहीं कर सकती क्योंकि प्रेम व नाम का रस, हृदय व आत्मा में गहरा निवास कर रहा होता है, यह जीवन का मूल आधार होता है। यह नाम आत्मा का बैकुंठ धाम है। यह आत्मा के दैवी सुर का परम आनंददायक मनोहर संगीत है। सतगुरु जी की कृपा से इस पवित्रा नाम की इलाही ध्वनि सम्पूर्ण शरीर के भीतर तथा आस-पास प्रत्येक वस्तु में समा जाती है। उन्होंने सांसारिक रिश्तों व कार्यकलापों से पहले ही मन का सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया था। सेवानिवृत्ति के पश्चात् उन्होंने अपने जीवन के 30 वर्ष सांसारिक बन्धनों से बिल्कुल मुक्त हो कर व्यतीत किए थे। वह सारे समय श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की सेवा व प्रेम-पूजा में मग्न रहते।

वह एक दृढ़ निश्चयी, परिश्रमी तथा अपने कत्र्तव्य के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित पुलिस अधिकारी थे। सेवानिवृत्ति के पश्चात् उन की सारी दृढ़ता, शक्ति तथा उत्साह केवल रूहानी उद्देश्य की प्राप्ति की ओर केन्द्रित रही। नाम-रस की पूर्ण अवस्था में वह सब में अपने प्रिय बाबा जी के दर्शन करते। इस अनुभूति में ईष्र्या, द्वेष, धोखा व गर्व के लिए कोई स्थान नहीं था। उनका निवास बाबा नंद सिंह जी महाराज जी के पवित्रा चरणों में था व रहेगा।

एक बार उन्होंने अपना स्थायी निवास का पता

बाबा नंद सिंह जी महाराज के चरण-कमलों में’

लिखवाया था। वह अब भी वहीं निवास करते हैं। यह एक अलौकिक हकीकत है कि अब भी अगर उन्हें मिलना हो तो बाबा नंद सिंह जी महाराज के पवित्रा चरण-कमलों द्वारा मिला जा सकता है। वह अपने प्रियजनों को उत्तर देते हैं तथा उनकी शंकाओं को दूर करते हैं।

लगभग सन् 1940 में बाबा जी ने दर्शन दे कर पिता जी को चरणों में छिप जाने का आदेश दिया था। सरदार सम्पूर्ण सिंह तथा अन्य सेवकों की नज़रों से पिता जी एक बार इस तरह से अलोप हो गए। इस निराली घटना की विशेषता यह है कि इसके उपरान्त पिता जी ने बाबा जी के चरण-कमलों का आश्रय कभी भी नहीं छोड़ा। वह अपने सभी कार्यकलापों के समय भी बाबा जी के पवित्रा चरणों में विचरण करते रहते। उनके प्रत्येक कार्य में से बाबा जी के चरण-कमलों के आनंद की सुगन्ध आती रहती। उनके चेहरे की नूरानी आभा उन की आत्मा का बाबा जी के चरण-कमलों में निवास होने की गवाही देता था। इस नाम-रस में रहते हुए वह चरण-कमलों की मौज का आनंद प्राप्त करते रहते थे।

पिता जी ने कभी भी किसी को अपने चरणों को स्पर्श करने की आज्ञा नहीं दी। एक बार उन्होंने मुझे कहा कि जब कोई उन के पैरों को हाथ लगाता है तो ऐसा अनुभव होता है, जैसे किसी साँप ने उनके पाँव पर डंक मार दिया हो। उनके लिए पैरों पर शीश झुकाना बहुत ही दुःखदायी अनुभव होता था।

वह अपने सभी कार्य श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के हुक्म के अनुसार करते। कोई भी कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व वह श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के हुक्मनामा लेते तथा उस के ऊपर दृढ़ निश्चय से अमल करते। वह रूहानी व सांसारिक कार्यों का मार्गदर्शन श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी से ही लेते। अपने प्रत्येक रूहानी व सांसारिक कार्य का मार्गदर्शन श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी से लेने के कारण उनका सम्पूर्ण जीवन प्रभुमय बन चुका था।

उन्होंने प्रभु-प्रेम का पूरा अमृत-सागर ही पी लिया था। इसलिये उनके जीवन का प्रत्येक क्षण प्रभु के प्रेम में व्यतीत होता। वह दिन-रात वाहेगुरु की उपस्थिति में गुज़ारते। उन्होंने जीवन का प्रत्येक पल अपने हृदय, मन व आत्मा को प्रिय स्वरूप बाबा जी के सजदे में झुकाए रखा।

सब कुछ बाबा जी के पवित्रा चरणों में समर्पित करके वह नाम-रस में मग्न तथा मस्त रहते थे। एक निराली रूहानी आभा जो उनके चेहरे पर झलकती थी, वह उनके पूर्ण मन की शान्ति व पूर्ण संतुष्टि का अपने आप में एक प्रमाण होती थी।

वह मध्यरात्रि के थोड़ा बाद उठते। स्वयं ‘कड़ाह-प्रसाद’ की देग तैयार करते। वह प्रातः दो बजे से लेकर 9-10 बजे तक श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की हजूरी में भजन व भक्ति करते थे। श्री गुरु ग्रंथ साहिब वाले कमरे से निकलने के समय उनके चेहरे पर उगते सूर्य की लाली जैसी अलौकिक आभा होती थी। यह आभा काफी समय बाबा जी व सतगुरु जी के साथ जुड़ा रहने का प्रमाण होती थी। इस आनंदावस्था में हमने उनके कई बार दर्शन किए थे। अपने प्रिय बाबा जी की याद में जब उनकी आँखों से आँसू बह कर बाबा जी के पवित्रा चरण-कमलों का स्नान करवाने लग पड़ते तो तब न उन्हें कोई रोक सकता और न ही उनका ध्यान विचलित कर सकता था। वह उस समय आनंद के सागर में डुबकियाँ लगा रहे होते। इस अवस्था में प्रिय स्वामी की याद के आनंद को प्राप्त ही किया जा सकता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उनकी भक्ति के प्रत्येक रूप में प्रेमा-भक्ति व दैवी प्रेम के दर्शन होते।

वह प्रेम की परम आनंद की स्थिति में ही गुरुवाणी पढ़ते, गुरुवाणी श्रवण करते तथा श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की सेवा करते। उनके तन, मन तथा आत्मा में प्रेमा भक्ति का निवास था। यह उन के जीवन का सवोच्च सार था। भजन व भक्ति के कारण वह सच्चे प्रेम की प्रतिमूर्ति बन चुके थे।

मृत्यु मुख में पहुँचने जैसी आकस्मिक चुनौती के समय भी वे बाबा नंद सिंह जी महाराज के दिव्य हाथों का कोमल स्पर्श व थपकी अपने सिर पर अनुभव करते थे। यह स्पर्श उन्हें विश्वास दिलाता था कि बाबा जी नित्य उनके साथ उपस्थित हैं। उन्होंने कई बार बाबा जी की यह दिव्य-वाणी सुनी,

“मेरे प्रिय पुत्रा, हम तेरे संग है।”

सन् 1947 के बँटवारे के भयानक दिनों के समय में पिता जी ने एक दृश्य में बाबा नंद सिंह जी महाराज के पवित्रा हाथों से खून बहते देखा था। पिता जी ने इस का रहस्य पूछा तो दयालु बाबा जी ने बताया,

“इस हाथ ने दुश्मन द्वारा तुम पर किये प्रत्येक आघात को, प्रत्येक प्रहार को सहा है।”
बाबा जी के पवित्रा हाथ सब कठिनाइयों के समय उन पर दैवी ढाल का कार्य करते रहे थे।

जब गुरु की निरन्तर उपस्थिति प्रत्येक श्वास में, जीवन के प्रत्येक क्षण में अनुभव होने लगती है, तो गुरु-चेतना एक उदात्त अवस्था तक, एक परम आनंद तक पहुँच जाती है।

सतगुरु जी के चरण-कमलों की दात था गुरु-चेतना का आनंद। यह एक ऐसी बौद्धिक तथा मानसिक समझ है, जिस का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार बाबा नंद सिंह जी महाराज ने जीवन का प्रत्येक क्षण प्रिय सतगुरु गुरु नानक साहिब जी की पवित्रा स्मृति में व्यतीत किया था, उसी प्रकार बाबा नरिन्द्र सिंह जी ने अपने जीवन का हर एक श्वास प्रिय बाबा नंद सिंह जी महाराज के चरण-कमलों में गुज़ार दिया था। उन्होंने अपने जीवन के हर पल में बाबा नंद सिंह जी महाराज की सदैव उपस्थिति की दात का यश-गायन किया।

प्रभु जिन पर प्रसन्न होता है, उन्हें दुःख का वरदान देता है। धार्मिक इतिहास साक्षी है कि प्रभु की प्राप्ति किसी को फूलों की सेज पर नहीं हुई थी।

श्री गुरु तेग बहादुर साहिब से भी यही प्रश्न पूछा गया था कि प्रभु के भक्तों को इतने दुःखों से क्यों गुज़रना पड़ता है। उन का उत्तर था,

“इस के बिना संसार के वास्तविक रूप को नहीं पहचाना जा सकता।”

यह सचमुच हैरानी की बात है कि एक के बाद एक आने वाली कठिनाइयों तथा आपत्तियों के समय भी पिता जी के चेहरे का नूर वैसा ही बना रहता, बल्कि रूहानियत और भी बढ़ जाती तथा उनका चेहरा दमकने लगता था। यहाँ तक कि जब पूज्य पिता जी 12 मार्च 1983 को दो बजे दोपहर अपना शारीरिक चोला छोड़ गए तथा उनका पवित्रा शरीर 5 दिनों के उपरान्त 16 मार्च 1983 को शाम 5 बजे विभोर साहिब सतलुज दरिया के किनारे उन के आदेशानुसार जल में प्रवाहित किया गया तो इन पाँच दिनों के दौरान उनका चेहरा निकलते सूर्य की लालिमा की तरह चमक रहा था तथा भौतिक मृत्यु इस आभा को कम नहीं कर सकी।

यह बाबा नंद सिंह जी महाराज के दिव्य प्रेम की निराली शान थी जो उन्होंने अपने प्रिय सेवक को दी थी।

जैसे-जैसे मेरे पिता जी के समक्ष आने वाले संकटों में वृद्धि होती गई त्यों-त्यों उनकी श्रद्धा, विश्वास व उनका भरोसा भी बढ़ जाता था। कोई भी सांसारिक कष्ट, दुःख-सुख, कोई भी सदमा, चाहे वह कितना भी पीड़ादायक क्यों न हो, भले ही उनकी पत्नी के देहांत और बाद में पुत्रा के देहांत जैसा सदमा क्यों न हो, उनके विश्वास तथा भरोसे को हिला नहीं सकता था। वह सांसारिक वेदनाओं के समय भी आत्मिक आनंद में रहते तथा अपने शीश पर अपने स्वामी बाबा नंद सिंह जी महाराज का हाथ अनुभव करते थे। उन्होंने अपने प्रिय प्रभु के प्रेम की वेदी पर सारे कष्टों को अर्पित कर दिया था। सच्चे भक्त कष्टों को वरदान के रूप में ग्रहण करते हैं।

प्रभु-प्रेमियों को ही पीड़ा का अधिकार मिलता है। वे दुःखों का स्वागत करते हैं और उनमें आनंद अनुभव करते हैं। जो प्रभु व सतगुरु को कर्त्ता मानते हैं उनके लिए दुःख-पीड़ा स्वागत के योग्य व सुखद आशीर्वाद है तथ प्रभु की ओर से दिया गया एक विशेष वरदान होता है।

कई बार बाबा नरिन्द्र सिंह जी कहा करते थे,

“नरिन्द्र सिंह काफी समय पहले ही मर चुका है।”

उनके प्रेम, अर्चना-पूजा, सेवा का परम उद्देश्य बाबा नंद सिंह जी महाराज थे, जो अपने सेवक के भीतर प्रत्यक्ष रूप में विचरण करते। गुरु-चेतना में प्रति-क्षण इस प्रकार निमग्न होने से उन्होंने अपनी वैयक्तिकता को खो दिया था। अपने अहंकार को तिलांजलि दे दी थी, अपनी पहचान भुला बैठे थे। तब वे बाबा नंद सिंह जी महाराज के दिव्य प्रकाश को ही अपने माध्यम से उद्भासित करते थे।

इस तरह चाहे उन्होंने अपने आप को मार लिया था परन्तु वास्तविक रूप में वह जागते थे। उन्होंने रूहानी उच्च अवस्था वाला जीवन व्यतीत किया था।