रूहानी विशेषताएँ

हम पहले ही बता चुके है कि सत्पुरुष बाबा जी सांसारिक आवश्यकताओं व सुख-सुविधाओं के प्रति विरक्त थे। यह एक रोचक तथ्य है कि वह सप्ताह में सिर्पफ एक बार दूध व वर्ष में एक-आध चपाती खाते थे। महाराज पटियाला बाबा जी के दर्शनों के लिए भुच्चों कलाँ आया करते थे। उन्होंने बाबा जी के रहने के लिए एक आलीशान बंगला बनवाया था तथा कई कीमती वस्त्रा व सुख-सुविधा की वस्तुएँ भेंट की थीं। परन्तु बाबा जी न ही उस बंगले के अन्दर कभी गए और न ही उन वस्त्रों व अन्य वस्तुओं का प्रयोग उन्होंने कभी किया। बाबा जी तो जन्म से ही देवदूत थे। उनकी कोई सांसारिक कामना नहीं थी तथा ये जीवन भर संसार से विरक्त रहे।

जन्मसि( महापुरुष होने के कारण आप सभी महान् व अलौकिक प्रभु-शक्तियों का भण्डार थे। नौ निधियाँ, सि(ियाँ एवं ट्ट(ियाँ दासी बनकर सेवा करने के लिए हर समय तत्पर रहती थीं। वे एक आध्यात्मिक सम्राट् थे। परोपकार की उनकी कामना तत्काल पूरी हो जाती थी।

बाबा जी ने गाँववासियों व उन की पफसलों को भयानक अग्नि से बचाने के लिए आकाश की तरपफ जब दृष्टिपात किया तो इन्द्र देवता ने उसी समय मूसलाधार वर्षा आरम्भ कर दी। एक मृत औरत, जिस का शरीर अग्नि की भेंट हो चुका था, अपने पति को घर में दबे हुए सोने व धन का गुप्त स्थान बताने के लिए प्रत्यक्ष में उपस्थित हो गई थी।

बाबा हरनाम सिंह जी महाराज हमेशा अपना मुख मण्डल कपड़े से ढाँप कर रखा करते थे। बचपन से ही उन की देह प्रकाशवान थी और उनके मुखमण्डल पर उगते हुए सूर्य जैसी लालिमा रहती। उन्होंने कभी भी अपने आप को प्रकट नहीं किया। उन्होंने सदैव इस दिव्य रूप को गुप्त रखने का प्रयास किया। परन्तु कोई भी साधारण व्यक्ति उनके महान् कार्यों वाले जीवन के रहस्य को नहीं समझ सकता था।

बाबा नंद सिंह जी महाराज के इस गुरु की महान् दिव्य शक्तियों व दिव्य-गुणों को देख कर लोग आश्चर्यचकित रह जाते तथा आदरपूर्वक उनके चरणों में प्रणाम करते थे। वे लोग भाग्यशाली हैं, जिन्होंने उन महापुरुषों की दिव्य आभा के दर्शन किए होंगे। पिता जी बड़े गर्व से कहा करते थे कि बाबा हरनाम सिंह जी महाराज जैसी रूहानी व अलौकिक ज्योति कभी-कभी ही विश्व में आती है। वह साधु के रूप में ईश्वर थे और ईश्वर के रूप में साधु थे। बाबा नंद सिंह जी महाराज का आध्यात्मिक स्वामी और उपदशेक और कौन हो सकता था? बाबा नरिन्द्र सिंह जी ने एक बार बाबा हरनाम सिंह जी महाराजबाबा नंद सिंह जी महाराज के पवित्रा चरण-कमलों पर ध्यान रख कर अश्रुपूरित सजल नेत्रों से अपने महान् स्वामी का यों श्र(ांजलि दी थी:

काल में कालरहित की अभिव्यक्ति ही परम सत्य है। जिस समय अकाल, काल ;समयद्ध में खेल खेलता या व्यक्त है, वह ही परम सत्य का, सत्य सरूप है।
बाबा नरिन्द्र सिंह जी

बाबा जी पवित्राता के सागर थे। उनके दर्शन करने से दूसरों के हृदय भी तत्काल पवित्रा हो जाते थे। उनके एक वचन या एक स्पर्श से व्यक्ति शारीरिक चेतना से ऊपर उठ जाता था। पूज्य बाबा जी के कृपापात्रा बने श्र(ालुओं को क्षण भर में ही अमृतरस का आस्वादन होने लगता था।

वह भूत, वर्तमान व भविष्य के सृजनहार स्वामी थे। वह मृतकों को भी शारीरिक रूप में ला सकते थे। वह अपने अति प्रिय पुत्रा ;बाबा नरिन्द्र सिंह जीद्ध की सलामी लेने के लिए पचास वर्षों से प्रतीक्षा में थे। वह समय के- काल के- स्वामी थे।