पवित्रा दृष्टिपात तथा स्पर्श

एक बार बाबा जी गाँव जण्डवाला के बाहर एक शुष्क पीपल के नीचे आसन लगा कर बैठे हुए थे। जून का महीना था। माला सिंह नाम का एक वृद्ध प्रतिदिन उस रास्ते से गुज़रता था। एक बार उसने बाबा जी से प्रार्थना की कि सेवक की कोई सेवा स्वीकार करें। बाबा जी ने उसका निवेदन स्वीकार किया तथा प्रतिदिन बाबा जी के लिए दूध लाने को कहा।

गाँव की ज़मीन रेतीली थी। भयानक गर्मी पड़ रही थी। माला सिंह को मालूम था कि बाबा जी जब से आए हुए हैं, एक ही स्थान पर बैठे रहते हैं। माला सिंह एक दिन उनसे यह पूछे बिना न रह सके कि आप बिना छाया के इतनी गर्मी वैफसे सहन कर लेते हैं। तब बाबा जी ने कहा:

माला सिंह! हमारा गर्मी-सर्दी से कोई सम्बन्ध नहीं है। हमारा इस शरीर से भी कोई सम्बन्ध नहीं है।

आत्म-रस में तथा हरि-रस में स्थायी रूप से लीन पूर्ण व सत्पुरुष दैहिक अनुभव से सदैव अलग रहते हैं। वे गर्मी-सर्दी और दुःख-सुख के द्वन्द्व से परे होते हैं। बाबा हरनाम सिंह जी महाराज ज्ञानी संत के वेश में स्वयं परमात्मा ही थे। वह भोला व्यक्ति इस आध्यात्मिक रहस्य को नहीं समझ सका। कृपालु बाबा जी ने उसे अगले प्रातः आने के लिए कहा। वह उनके कहे अनुसार अगले दिन प्रातःकाल आ गया। बाबा जी ने उसको कुछ दूरी पर बैठकर ‘वाहे गुरु’ शब्द का पवित्रा जाप करने को कहा। उसे यह भी समझाया कि वह केवल बुलाने पर ही आए। माला सिंह वहाँ बैठ कर पवित्र नाम का जाप करने लगा।

जब बाबा जी ने उस का नाम लेकर पुकारा तो उसकी आनंद-समाधि टूटी। तब उसको ध्यान आया कि शाम हो चुकी थी।

बाबा हरनाम सिंह जी की अपार कृपा तथा अमृत नाम-रस का भरपूर आनंद ले रहे इस सिख को पूरे दिन इतनी तेज गर्मी व बहती लू अनुभव ही नहीं हुई।

बाबा जी के अद्भुत वचन सुनने या उनके दर्शन करने से ही नाम-रस, व आत्म-रस की ऐसी महान् अवस्था प्राप्त हो जाती है, जिसमें मनुष्य अपने शरीर का अस्तित्व खो देता है। महापुरुष अपने दिव्य दृष्टिपात व स्पर्श से ही इस नाम-महारस की ऊँची पदवी प्रदान कर देते थे। यह प्रभाव तत्काल होता था। अनगिनत भाग्यशाली आत्माएँ उदारता और अनन्त दया-भावना के सागर बाबा जी से इस आशीर्वाद को प्राप्त कर सकी थीं।

उनके वचनों या स्पर्श में इतनी शक्ति व इतना चुम्बकीय आकर्षण था कि मनुष्य में आध्यात्मिक चेतना पैदा हो जाती थी तथा उसकी चेतना में भौतिक अनुभूति का लोप हो जाता था।